उदयपुर। अरावली पर्वतमाला को परिभाषित करने और उसके संरक्षण से जुड़े विषय को लेकर राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद, उदयपुर ने विशेषज्ञों के साथ व्यापक चर्चा कर सरकार के समक्ष कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं। परिषद का कहना है कि अरावली केवल पर्वतमाला नहीं, बल्कि जनजाति क्षेत्र की जीवनरेखा है। इसके संरक्षण और विकास की कार्ययोजना तैयार करने से पहले अरावली क्षेत्र में निवासरत जनजाति समाज से व्यापक एवं सार्थक संवाद आवश्यक है।
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम की ओर से अरावली पर्वत को परिभाषित करने के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष को 2 अगस्त को पत्र भेजकर समिति का कार्यकाल दो माह बढ़ाने की मांग की गई है। पत्र में कहा गया है कि वर्तमान में समिति को दिया गया 20 दिन का समय व्यापक जनपरामर्श के लिए व्यावहारिक नहीं है। इतने कम समय में प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह सकती है।
जनजाति प्रतिनिधियों और आयोग से हो परामर्श
कल्याण आश्रम के अखिल भारतीय संयुक्त महामंत्री विष्णु कान्त ने पत्र में बताया कि अरावली क्षेत्र में राजस्थान और गुजरात के जनजाति समुदाय के लाखों लोग सुदूर क्षेत्रों में निवास करते हैं। यह क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत भी आता है। ऐसे में समिति की ओर से किए जाने वाले क्षेत्रीय दौरों की जानकारी प्रभावित पंचायतों तक हिंदी एवं गुजराती भाषा में व्यापक रूप से पहुंचाई जानी चाहिए।
परिषद ने जनजाति जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से भी व्यापक परामर्श किए जाने की मांग की है। परिषद का कहना है कि जनजातियों से जुड़े नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श संविधान के अनुच्छेद 338ए के तहत महत्वपूर्ण है।
5-7 दिन के दौरे में संभव नहीं व्यापक चर्चा
परिषद के अनुसार अरावली क्षेत्र का भौगोलिक विस्तार काफी बड़ा है और जनजाति समाज दूर-दराज के इलाकों में निवास करता है। ऐसे में केवल 5 से 7 दिन के क्षेत्रीय दौरों से सभी प्रभावित लोगों तक पहुंचना और उनके सुझाव प्राप्त करना संभव नहीं होगा। इसलिए समिति को अपना कार्यकाल बढ़ाने के लिए उच्चतम न्यायालय से भी आवश्यक अनुमति मांगनी चाहिए।
सुझाव देने की प्रक्रिया सरल बनाने पर जोर
पत्र में सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया को भी सरल बनाने की मांग की गई है। परिषद ने कहा कि सुझाव हिंदी, गुजराती अथवा अंग्रेजी में स्वीकार किए जाएं। साथ ही केवल वेबसाइट के माध्यम से सुझाव लेने के बजाय डाक द्वारा लिखित सुझाव भेजने की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाए।
परिषद का कहना है कि वर्तमान प्रारूप सामान्य और कम पढ़े-लिखे व्यक्ति के लिए कठिन है। ऐसे में बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं जनजाति समाज के लोग अपनी आपत्ति अथवा सुझाव दर्ज कराने से वंचित रह सकते हैं।
विशेषज्ञों ने प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजने का लिया निर्णय
प्रदेश महामंत्री वीरेन्द्र प्रकाश पंचोली ने बताया कि राजस्थान वनवासी कल्याण परिषद, उदयपुर की बैठक में विषय विशेषज्ञों के साथ अरावली संरक्षण को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। बैठक में विशेषज्ञों ने उपरोक्त मांगों को सरकार के उच्च स्तर तक पहुंचाने के लिए प्रस्ताव पारित किया।
परिषद ने स्पष्ट किया कि अरावली के विकास और संरक्षण की कोई भी कार्ययोजना जनजाति समाज से व्यापक चर्चा के बिना तैयार नहीं की जानी चाहिए। जनजाति समाज का अरावली से सदियों पुराना संबंध है और वह प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से इस पर्वतमाला के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। इसलिए अरावली से जुड़े किसी भी बड़े निर्णय में स्थानीय जनजाति समाज की भागीदारी और उसके सुझावों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।







