राजस्थान सरकार ने नगर निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के सभापतियों की लॉटरी में OBC, SC और ST वर्ग के साथ अन्याय किया है, बेईमानी की है-प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा
टोंकराजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने मिडिया से बातचीत करते हुए कहा कि ये सिर्फ आरक्षण के आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि संविधान की उस भावना को कुचलने की कोशिश है, जो हर वंचित और पिछड़े वर्ग को उसकी आबादी के अनुपात में न्यायपूर्ण भागीदारी का अधिकार देती है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी भागीदारी” और सामाजिक न्याय की बात करते हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि सत्ता, संस्थाओं और संसाधनों में भागीदारी केवल कुछ वर्गों तक सीमित नहीं रह सकती। लेकिन भाजपा सरकार राजस्थान में इसके ठीक उलट रास्ते पर चलती दिखाई दे रही है। OBC, SC और ST की वास्तविक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के बजाय आंकड़ों को इस तरह पेश किया जा रहा है कि उनका संवैधानिक अधिकार ही सीमित हो जाए।
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में ग्रामीण आबादी को लेकर ही गंभीर विसंगतियां हैं। एक जिले की ग्रामीण OBC आबादी जिला परिषद और उसी जिले की पंचायत समितियों में तार्किक रूप से एक-दूसरे के अनुरूप होनी चाहिए, लेकिन कई जगह दोनों आंकड़ों में कई प्रतिशत का अंतर है। आखिर एक ही ग्रामीण आबादी का आंकड़ा अलग-अलग संस्थाओं के लिए अलग कैसे हो सकता है?
प्रदेश के 41 जिला परिषदों में 1,403 निर्वाचन क्षेत्रों में OBC के लिए केवल 192 वार्ड, यानी मात्र 13.68% आरक्षित करने की अनुशंसा की गई। जबकि 50% की सीमा के भीतर OBC को 21% आरक्षण दिया जाता तो 294 वार्ड आरक्षित हो सकते थे, यानी 102 वार्ड कम आरक्षित किए गए।
इसी तरह राजस्थान की 457 पंचायत समितियों में 8,245 निर्वाचन क्षेत्रों में OBC के लिए केवल 1,101 वार्ड, यानी लगभग 13.35% आरक्षित किए गए। 21% OBC आरक्षण दिया जाता तो 1,731 वार्ड आरक्षित हो सकते थे, यानी 630 वार्ड कम आरक्षित हुए।
अलग-अलग जिलों के सामने आए आंकड़े चौंकाने और सरकार के मनमाने रवैए को दर्शा रहे हैं। अजमेर में SC-ST और OBC का कुल आरक्षण 39.97%, बालोतरा में 41.93%, बाड़मेर में 43.24%, ब्यावर में 33.3%, चूरू में 46.75%, डीग में 34.48%, डीडवाना-कुचामन में 42.85%, जैसलमेर में 38%, झुंझुनूं में 39%, खैरथल-तिजारा में 36%, कोटपूतली-बहरोड़ में 37%, फलोदी में 39.13% और सीकर में 40.8% रखा गया है।
सवाल सीधा है.. जब 50% की सीमा के भीतर इन वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की गुंजाइश थी, तो कई जिलों में SC-ST और OBC की हिस्सेदारी 40% से भी नीचे क्यों समेट दी गई? आबादी अधिक, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम.. आखिर ये आरक्षण की नीति है, या सामाजिक न्याय के अधिकारों को सीमित करने का सोची-समझा षड्यंत्र? सरकार को हर जिले में तय किए गए प्रतिशत का स्पष्ट और तार्किक आधार सार्वजनिक करना चाहिए।
अलवर, चित्तौड़गढ़, दौसा, करौली और श्रीगंगानगर में OBC सीटों का प्रतिशत 9.9% के आसपास, जबकि डीडवाना-कुचामन, पाली, फलोदी और राजसमंद में 11.11% रखा गया है। जब OBC की आबादी इन जिलों में 45–50% से अधिक बताई जा रही है, तो आरक्षण का यह आधार क्या है? सरकार को सार्वजनिक रूप से इसका जवाब देना चाहिए।
और अब सबसे बड़ा सवाल.. क्या राजस्थान सरकार OBC, SC और ST को उनके अधिकारों के लिए एकजुट होते देखकर जातियों को आपस में लड़ाना चाहती है? OBC रिपोर्ट को लेकर जिस तरह के अधूरे और विवादित आंकड़े सामने आ रहे हैं, उससे समाज में भ्रम पैदा हो रहा है। सरकार को पारदर्शिता के साथ बताना चाहिए कि ये आंकड़े किस सर्वे, किस वैज्ञानिक पद्धति और किस मानक के आधार पर तैयार किए गए हैं।
OBC, SC और ST किसी का हक नहीं चाहते, वे अपना संवैधानिक अधिकार और सम्मानजनक भागीदारी चाहते हैं। राहुल गांधी जी जिस सामाजिक न्याय की लड़ाई को देशभर में आवाज़ दे रहे हैं, राजस्थान में भाजपा सरकार उसी न्याय की भावना को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
ये सिर्फ 102 जिला परिषद या 630 पंचायत समिति वार्डों का सवाल नहीं है। ये संविधान की भावना के खिलाफ भाजपा सरकार की तानाशाही है।
राजस्थान सरकार जवाब दे.. आखिर OBC, SC-ST की हिस्सेदारी घटाने का आधार क्या है, और संविधान की भावना के साथ ये खिलवाड़ क्यों? सामाजिक न्याय की आवाज दबेगी नहीं। कांग्रेस पार्टी पूरी मजबूती के साथ हर समाज के हक की लड़ाई लड़ेगी। पंचायत और निकाय चुनाव में भाजपा को इस बेईमानी का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।