सलूंबर जिले के सेमारी अरावली की पहाड़ियों से गूंजने वाले सेमारी के पारंपरिक ढोल की धमक अब राजस्थान ही नहीं बल्कि गुजरात और मध्यप्रदेश तक सुनाई दे रही है होली पर्व नजदीक आते ही कस्बे में ढोल और कुंडी की खरीदारी को लेकर उत्साह बढ़ गया है सेमारी कस्बे में लोहार समाज के कारीगरों द्वारा बनाए जाने वाले लोहे, पीतल और तांबे के ढोल व कुंडियां मेवाड़, मारवाड़ मध्यप्रदेश और गुजरात सहित कई राज्यों में विशेष पहचान रखती हैं कारीगर होली से करीब तीन महीने पहले ही ढोल निर्माण कार्य शुरू कर देते हैं इनकी बिक्री होली से लगभग 15 दिन पूर्व तेज हो जाती है। कस्बे के विभित्र दुकानों में हजारों की संख्या में ढोल और कुंडियां तैयार की जा रही हैं स्थानीय ग्राहकों के साथ-साथ गुजरात मारवाड़ और मध्यप्रदेश से व्यापारी बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर ढोल खरीदकर ले जाते हैं कारीगरों का कहना है कि सेमारी में पीढ़ियों से पारंपरिक तरीके से ढोल बनाने की कला चली आ रही है, इसे नई पीढ़ी भी पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। होली पर सेमारी का ढोल घर में रखना शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है कई खरीदार ढोल खरीदते समय पूजा-अर्चना कर नारियल चढ़ाते हैं और प्रसाद वितरण के बाद उसे घर ले जाते हैं। धुलेंडी और ढूंढ़ोत्सव जैसे अवसरों पर परिवार के साथ ढोल और कुंडी बजाकर होली का उल्लास मनाया जाता है होली के दौरान गैर नृत्य आयोजनों में इन ढोलों की विशेष धुन गूंजती है इसके अलावा मंदिरों में भी भक्ति भाव से ढोल बजाए जाते हैं पहाड़ी क्षेत्रों के ग्रामीण इलाकों में किसी अनहोनी या खतरे की स्थिति में ढोल की विशेष तर्ज बजाकर लोगों को एकत्रित करने की परंपरा भी आज तक कायम है सेमारी के पारंपरिक ढोल न केवल उत्सवों की पहचान बने हुए हैं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी सहेज रहे हैं।