
बाहर अलग-अलग रूप में रोज नए-नए आकृतियां बनती है और फूलों के माध्यम से उनको सजाती है पूर्णिमा से प्रारंभ होने पर उसको पाटला पूनम भी कहा जाता है जिस दिन 5 हाथ या पांच फूल जैसे बनाए जाते हैं उसके बाद जितनी भी तिथि आती है हर तिथि पर संख्या के अनुसार चित्र बनाए जाते हैं जो की गोबर से बनते हैं जैसे एकम पर एक डोली बीज पर बिजोरा तीज पर तीन तिवारी चतुर्थी या चौथ पर चौपड़ पासा चर भर पांचवी तिथि पर पांच सुपारी पांच सिंघाड़े पांच कुंवारे छठ पर छतरी छाछ बिलोना छाबड़ी फूलों की सातम पर सातीया सप्त ऋषि अष्टमी पर आठ काली का फूल आम अन्नपूर्णा नवमी पर निशानी नगाड़े की जोड़ नव 10वीं पर 10 थैली का बंदनवार 10 दिए दशा माता या दियाडी बनाई जाती है एकादशी पर गुल्ली डंडा डंका झालर राम रावण बनाए जाते हैं और द्वादशी या बारस तिथि पर संध्या का कोर्ट बनाया जाता है यह संध्या का महल होता है और उस दिन इसको माली पन्ना से सजाया जाता है । आगे के तीन दिनों तक संध्या ऐसे ही रहती है कोट के दिन चांद सूरज मीराबाई कौवा चोर सिपाही डोली नाई और जाड़ी जसोदा पतली पेमल यह सब भी बनाए जाते हैं संध्या के कोट यानी कि महल के अंदर रथ डोली घोड़े निशानी और जो 12 दिनों में जो चीज है भरी जाती है वह सारी उसमें उकेरी जाती है पर्व के आखिरी दिन यानी अमावस पर कुंवारी कन्याओं के नाम से उद्यापन किया जाता है जिसमें की गुड धनी भरकर मिट्टी के कुल्हड़ बांटे जाते हैं और यह पर्व कन्याओं के 16 वर्ष तक होने पर मनाया जाता है इस पर्व में प्रतिदिन जो आकृति ऊकेरी जाती है उनमें चांद सूरज कौवा और मीराबाई रोज बनाए जाते हैं उसके अतिरिक्त वाली जो आकृतियां हैं वह रोज नहीं बनती है संध्या काल में यह कार्य किया जाता है पुरानी संध्या को हटाकर नई संध्या उकेरी जातीWhatsApp us