रघुवीर की एंट्री से बदली सियासी बिसात उदयपुर ग्रामीण सीट पर दावेदारों की ‘कुर्सी रेस’ तेज

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उदयपुर कांग्रेस संगठन इन दिनों भीतरखाने जबरदस्त मंथन के दौर से गुजर रहा है। रघुवीरसिंह मीणा का जिलाध्यक्ष बनना केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले तीन वर्षों की राजनीतिक दिशा तय करने वाला फैसला माना जा रहा है। चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि रघुवीरसिंह मीणा वह चेहरा हैं, जो चाहें तो प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में भी शामिल हो सकते थे, लेकिन उन्होंने उदयपुर देहात की सियासी रणभूमि को चुना।

सूत्रों के अनुसार, यह नाम दिल्ली स्तर तक स्वीकार्य रहा और सचिन पायलट की सहमति से आगे बढ़ा। खास बात यह कि शुरुआत में रघुवीर का नाम पैनल में नहीं था, बाद में जोड़ा गया—जो साफ संकेत देता है कि फैसला साधारण नहीं, बल्कि रणनीतिक था।सलूंबर से फोकस हटकर उदयपुर ग्रामीण की ओर?बीते उपचुनाव में कांग्रेस की हार के बाद रघुवीरसिंह मीणा सलूंबर में बेहद सक्रिय नजर आए। सामाजिक कार्यक्रमों से लेकर हर छोटे-बड़े अवसर पर मौजूद रहकर वे अपनी खोई जमीन वापस लेने की कोशिश में जुटे रहे। लेकिन जिलाध्यक्ष की कुर्सी ने समीकरण बदल दिए। अब सलूंबर उनकी प्राथमिकता में पीछे जाता दिख रहा है, जबकि उदयपुर ग्रामीण में उनकी मौजूदगी बढ़ती नजर आ रही है। यह बदलाव समय का फेर है या राजनीतिक मजबूरी—यह खुद रघुवीर के लिए भी आसान फैसला नहीं दिखता। परमानंद-रेशमा समीकरण और बसंती मीणा की घटती भूमिका इस बीच परमानंद मेहता का जिलाध्यक्ष बनना भी अहम राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। वे रेशमा मीणा के चुनाव संयोजक रह चुके हैं और संगठन में अब स्पष्ट संदेश है कि विधायक प्रत्याशी को साथ लेकर चलना है। इस नए समीकरण में रघुवीर की धर्मपत्नी बसंती मीणा, जो 2013 और 2018 में प्रत्याशी रह चुकी हैं, फिलहाल हाशिये पर जाती दिख रही हैं। यही कारण है कि बीज-खाद जैसे मुद्दों पर ज्ञापन देते समय भी रघुवीर खुद मोर्चे पर नजर आए, जबकि बसंती मीणा की फील्ड प्रेजेंस कमजोर पड़ती दिख रही है। परमानंद मेहता की सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी रेशमा मीणा की प्रमुखता साफ दिखाई दे रही है। इससे संगठन में यह संदेश जा चुका है कि उदयपुर ग्रामीण में रेशमा की पकड़ मजबूत की जा रही है। धरना-प्रदर्शन और दो मोर्चों की चुनौती उदयपुर में कांग्रेस के धरना-प्रदर्शन तेज हैं। ऐसे में रघुवीरसिंह मीणा को शहर और ग्रामीण दोनों मोर्चों पर निर्णायक उपस्थिति बनाए रखना पड़ रही है। राजनीतिक जानकार याद दिलाते हैं कि 2018 में, जब सचिन पायलट प्रदेश अध्यक्ष थे, तब रघुवीर को उदयपुर ग्रामीण से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था। अब वही बीज दोबारा अंकुरित होते नजर आ रहे हैं। विवेक कटारा की दूरी और नए संकेत रघुवीर के जिलाध्यक्ष बनने के बाद एआईसीसी की दिल्ली महारैली को लेकर हुई बैठक में विवेक कटारा की गैरमौजूदगी ने सवाल खड़े कर दिए। उदयपुर देहात की लगभग सभी विधानसभा से बसें गईं, लेकिन उदयपुर ग्रामीण से एक भी बस नहीं जाना, सियासी संकेत माना जा रहा है।
विवेक कटारा के सामने चुनौती यह भी है कि उनका परिवार लगातार तीन चुनाव हार चुका है, और हर बार हार का अंतर बढ़ा है। ऐसे में पार्टी के भीतर चर्चा है कि रघुवीरसिंह मीणा उदयपुर ग्रामीण के लिए ‘सेफ और स्वीकार्य फेस’ बन सकते हैं—साफ छवि, सॉफ्ट इमेज और विवादों से दूर। दिव्यानी कटारा और ताराचंद मीणा भी रेस में दिव्यानी कटारा ने सोशल मीडिया पर अपने नाम के साथ ‘उदयपुर ग्रामीण’ जोड़कर मैदान में उतरने का संकेत दे दिया है। वहीं, उनके राजनीतिक मार्गदर्शक माने जाने वाले ताराचंद मीणा भी खुद को संभावित दावेदार मानते हैं।
लोकसभा चुनाव में झाड़ोल से मामूली अंतर से हारने के बावजूद, उदयपुर ग्रामीण की राजनीति उन्हें आकर्षित कर रही है। फिलहाल वे खुलकर सामने नहीं आए हैं, लेकिन रेस बेहद दिलचस्प हो चुकी है।कार्यकर्ता ‘वेट एंड वॉच’ मोड में इन तमाम समीकरणों के बीच कांग्रेस कार्यकर्ता पसोपेश में हैं। नजर इस पर है कि रघुवीरसिंह मीणा की पीसीसी में कितनी पकड़ है, सचिन पायलट से उनका रिश्ता कितना मजबूत है और दिल्ली में उनका वजन कितना है।
फिलहाल पार्टी में एकछत्र नेतृत्व का अभाव दिखता है, और यही वजह है कि कार्यकर्ता अभी ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपनाए हुए हैं। पंचायत से विधानसभा तक अग्निपरीक्षा आने वाले पंचायत चुनाव रघुवीरसिंह मीणा के लिए अग्निपरीक्षा होंगे। छह विधानसभा क्षेत्रों की पंचायतों के साथ-साथ सलूंबर की पंचायत समितियां और पालिका बचाना भी बड़ी चुनौती है।
साफ है कि उदयपुर कांग्रेस की राजनीति निर्णायक मोड़ पर है। रघुवीरसिंह मीणा सबको साथ लेकर कितनी जल्दी संतुलन बना पाते हैं, यही तय करेगा कि उदयपुर ग्रामीण की कुर्सी पर आखिरकार कौन बैठेगा। मुकाबला लंबा है—और बेहद दिलचस्प भी।

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